Saturday, July 23, 2011

ये ज़िन्दगी...



ये ज़िन्दगी
जो दिनों से मिनटों में
फिर लम्हों में फिसल रही है,
जो आज तुम्हारी 
नसों में, रगों में, दिलों में
मचल रही है;
तुम्हारी आवाज़ में गले से
निकल रही है,
फिर लफ़्ज़ों में ढल रही है
कभी शोर, कभी ग़ज़ल रही है..

ये ज़िन्दगी
आँखों में जो ख्वाब-सी पल रही है,
एक अरसे से जहां को 
छल रही है;
हाँ कुछ लोगों को खल रही है..

ये ज़िन्दगी
हिमालय की बर्फ-सी 
पिघल रही है;
कहीं आंसुओं की नमी में
जड़ों से गल रही है,
कभी-कभी
बच्चों-सी चंचल रही है..

ये ज़िन्दगी
अन्दर गहराइयों में
ज्वालामुखी-सी जल रही है,
कुछ नशे में
डगमगाकर, ठोकरे खाकर 
अब शायद संभल रही है..
चेहरे पे मुस्कान है मगर
ग़मों को निगल रही है..
खुद से पूछों
क्या सचमुच सफल रही है?

ये ज़िन्दगी
न जाने कितनी सदियों से 
यूं ही शक्लें 
बदल रही है;
कौन कहता है
तय रास्तों पर
चल रही है... 


Saturday, June 4, 2011

राम-(देव)-लीला


रोज़ सुबह जब T.V. चलाओगे,
100 चैनलों पर 200 बाबा पाओगे.
कोई प्रवचन सुनाएगा,
कोई भजन गाएगा;
कोई बताएगा आपका भविष्य,
किसकी सुनें किसकी नहीं
आप सोचते रह जाओगे..

हम इस दौर में रहते है
जहां धर्म बड़ा कारोबार है,
इसके कई ठेकेदार हैं..
जो नए-नए तरीकों से करते अपना प्रचार हैं..
ये तथाकथित "धर्म-गुरु" खुदको
देव, महाराज, बापू कहलवाते हैं,
कुछ ऐसे भी है जो अपने ही नाम में
तीन बार "श्री" लगाते है!

विदेशी बैंकों में पड़ा है ढेर सारा काला धन,
जानकार चिंतित हुआ एक सच्चे योगी का मन..
दिल्ली के रामलीला में देखिये
रामदेव की लीला और
करोड़ों का आलीशान अनशन..

राम जाने ये कौन-सा योग है
लगता एक ज़ोरदार प्रयोग है;
हाँ इसमें दो राय नहीं
भ्रष्टाचार सबसे बड़ा रोग है..
मगर सिर्फ "वो" ही दोषी नहीं,
इसमें बराबरी  के ज़िम्मेदार
हम सब लोग है..

बाबा जो इस कदर मीडिया में छाने लगे हैं,
मुझे ललित मोदी से नज़र आने लगे हैं..
सुभाषचन्द्र की तरह लग रहें हैं अन्ना
जो है इसी किताब का पिछ्ला पन्ना..

दुनिया जानती है IPL से पहले ICL आया था;
बाबा मान लीजिये ये मुद्दा पहले अन्ना ने उठाया था..

आमरण अनशन एक तरीके का blackmail है,
जो अब बन चुका राजनीतिक खेल है..
400 रूपए की बोतल में पतंजलि  का तेल है,
जो 4 जून से दिल्ली में 'available on sale' है..

लोग समझते है राजघाट में बापू
आराम से सो रहा है,
मगर मैं मानता हूँ
सत्याग्रह का बाज़ारीकरण देखकर
आज, बापू रो रहा है..

इन सब का परिणाम आप भी जानते है,
न जाने क्यूँ फिर भी इसे संग्राम मानते हैं..
जो पहनाई थी अन्ना को, वही टोपी
बाबा, सरकार आपको भी पहनाएगी;
एक "उच्च-स्तरीय" committee बनाएगी;
मुद्दों की पुरानी बड़ी कब्र खोदकर
उसमें एक और दफ्नाएगी..

बाबा चिंतित हम दोनों हैं,
मगर ज़रा-सा फर्क है:
आपकी चिंता काला धन है,
मेरी चिंता काला मन है..


Friday, May 20, 2011

एक ख़त राहुल गांधी के नाम

आदरणीय राहुलजी,

मैं यहाँ कुशल-मंगल नहीं हूँ और जानता हूँ कि आप भी कतई नहीं होंगे. Facebook के status updates और Twitter के 140 अक्षरोंवाले इस techno-savvy ज़माने में आपको हैरानी हो सकती है कि कोई चिट्ठी क्यूँ लिख रहा है. दरअसल मेरा मानना है कि अपने विचारों को अगर किसी तक पहुंचाना हो तो एक ख़त से बेहतर कोई माध्यम हो ही नहीं सकता.

खैर, सबसे पहले तो मैं आपको मुबारकबाद देना चाहूँगा कि आपने भारतीय नेता बनने का आखरी पड़ाव भी बखूबी पार कर लिया. आप गिरफ्तार हुए तो मुझे लगा मानो देश को एक और सच्चा जनसेवक मिल गया. चलिये इस बहाने आप T.V. पर तो आये, वरना बिहार के नतीजों के बाद आपके दर्शन दुर्लभ हो गए थे.

पता नहीं इसे आपकी नादानी कहूँ या कुछ और जो आपने कुछ दिन पहले कह दिया कि U.P. के हालात देखने के बाद आपको हिन्दुस्तानी होने पर शर्म आ रही थी. (मेरा मानना है शर्म ऐसी बात कहने में आनी चाहिए) और साहब अब आप कह रहे है कि भट्टा-परसौल में 74 लोगों को जलाया गया और कई महिलाओं के साथ पुलिस-कर्मियों ने बलात्कार किया. वैसे आपकी इस बात का समर्थन तो वो लोग खुद नहीं करते जिनके लिए आप ये सब कर रहे है, या कम-से-कम करने का दिखावा तो कर ही रहे है. आपके इस बेतुके बयान से पार्टी न तो पलड़ा झाड़ सकती है और ना ही समर्थन कर सकती है.


मेरी मानें तो फिलहाल जैसा आपके गुरु दिग्विजय सिंह कहते है वैसा ही कहिये और वैसा ही कीजिये. आपको बयानबाजी के गुर सीखने में अभी शायद और वक़्त लगेगा. कुछ राजनीतिक मार्गदर्शन अहमद पटेलजी से भी ज़रूर लीजियेगा, उन्हें इस में महारत हासिल है.

शायद आप देश के बदलते राजनीतिक माहौल से वाकिफ़ नहीं है. आपको देखकर बिलकुल नहीं लगता कि आपने बिहार चुनाव से कुछ सीखा है. आपको याद दिला दूँ कि आपने इस राज्य में प्रचार के लिए 70 जिलों का दौरा किया था और कांग्रेस बिहार में केवल शर्मनाक 4 सीटें ही जीत पायी. वो भी उन जिलो में जहां आप कभी गए ही नहीं. बाकी लगभग सभी उम्मीदवारों की ज़मानत जब्त हो गयी.

आप मानते हैं कि देश के युवा को राजनीति में शामिल होना चाहिए. ये सोच बहुत अच्छी है और ज़रूरी भी. मगर इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव भी ज़रूरी है. मिसाल के तौर पर गैर-राजनीतिक परिवार के युवकों को मौक़ा मिलना चाहिए. कांग्रेस के कुल 78 युवा सांसदों में से अधिकतर  राजनीतिक परिवारों से है. 30 साल से कम उम्र के सभी सांसद किसी कांग्रेसी नेता के बच्चे है. मैं सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं की बहुत इज्ज़त करता हूँ लेकिन और भी कई हक़दार और होनहार उम्मीदवार है जिन्हें मौक़ा मिलना चाहिए.

अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि चाहनेवालों और मतदाताओं में बहुत फर्क होता है. चुनाव जीतने के लिए एक खूबसूरत चेहरा और सटीक उपनाम काफी नहीं होता; और जनता को बेवक़ूफ़ समझना सबसे बड़ी बेवकूफी है. इस बात को जितनी जल्दी आप समझेंगे उतना बेहतर होगा, आपके लिए, पार्टी के लिए और देश के लिए.

भगवान् आपको सद्बुद्धि दे.
अपना ख़याल रखिये.

Tuesday, December 28, 2010

अलविदा 2010!

हम सालों में ज़िन्दगी कम और ज़िन्दगी में साल ज़्यादा जोड़ रहे हैं. हो सके तो एक new year resolution लेकर इस रिवाज़ को बदल दीजिये. एक दृष्टि बीती पर डालिये और यादों की पोटली टटोलकर जितनी भी खुशियाँ, संभावनाएं और सीख मिलती हैं उन्हें सहेज कर रख लीजिये और बाकी चीज़ों का tension मत लीजिये. मेरा मानना है कि हर चीज़ अपनी उम्र जीती है और अतीत का हिस्सा हो जाती है. और अगर अतीत ससीम है, तो भविष्य असीम है.

ज़िन्दगी की किताब का पन्ना बदल रहा है,
आगे न जाने क्या लिखा है, साल ढल रहा है..


नए के स्वागत में सब लगे है, जानेवाले की कद्र नहीं,
यही देखकर जल रहा है, साल ढल रहा है..


कुछ खुशियाँ, कुछ ग़म और ढेर सारी यादें,
जमा-पूँजी देकर निकल रहा है, साल ढल रहा है..


नयी उम्मीदें, नयी संभावनाएं और कुछ नए संकल्प,
नया ख्वाब भी पल रहा है, साल ढल रहा है..


इस तमन्ना के साथ कि 2011 इससे बेहतर होगा,
करें 2010 की विदाई, साल ढल रहा है..


मैं जानता हूँ कि आनेवाला साल अपने साथ नए घोटालें और नए कांड लेकर आएगा. खैर, फिर भी दुआ है कि 2011 में government नहीं governance बदले और corruption का virus थोड़ा कमज़ोर हो ताकि सुरेश कलमाड़ी, नीरा राडिया और ए. राजा जैसे महानुभावों के नाम कम सुनने मिले. उम्मीद है कि नए वर्ष में खेल गंभीर समस्या होगा, न कि गंभीर समस्या खेल.

स्वस्थ रहिये! मस्त रहिये! नया साल मुबारक हो!

Wednesday, October 20, 2010

रावण, नेताजी और मैं

नज़्म, ग़ज़ल, हिंदी किताबत और अंग्रेजी articles से हटकर, काफी समय बाद हिंदी कविता लिखी है; उम्मीद है आपको पसंद आए. इस में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल उनके effect के लिए किया है, क्यूंकि उन शब्दों के हिंदी अनुवाद मुझे उतने प्रभावशाली नहीं लगे. और वैसे भी, ज़माना Hinglish का है!




रावण दहन देखने पहुंचा मैं मैदान में,
काफी लोग आये थे लंकेश्वर के सम्मान में..
Chief-guest था शहर का एक नेता,
जो मौका मिलने पर पुतले से भी वोट मांग लेता..

रावण के पुतले को लगाने आग, 
जैसे ही मंत्रीजी ने 
माचिस की  तिली जलाई;
पुतले की आत्मा ज़ोर से चिल्लाई, 

" ऐ मेरे कलयुगी भाई!
अपने ही हाथों से,
 मुझे आग मत लगाओ.. 
बड़े भैया होकर
अनुज को न जलाओ! 

हम दोनों रावण के प्रतीक हैं तो क्या हुआ,
हमारे पास कुर्सी है, power है, नाम है..
अपने ही बिरादरों को मारना-काटना-जलाना
राक्षसों का नहीं, इन्सानों का काम है..

आपकी मेहरबानी से नेताजी,
हमारी राक्षसी संस्कृति
आज भी लोगों में ज़िंदा है..
और हमारे half-murder के जुर्म में,
राम आज तक शर्मिन्दा है..

इसीलिए मेरे जात-भाई,
आग लगाना भूल जाइए..
एक नया धार्मिक मुद्दा उठाइये,
और नए झूठोंवाला manifesto बनाइये!

बिहार- U.P. में election है,
तुम राजनीतिक रोटियाँ सेको..
इन्सानियत के राम को जहां देखों,
जड़ समेत उखाड़ फेकों!

फ़िक्र नहीं, फ़क्र करो यही बात,
हमारी जाति का पताका फहराएगी..
बिना quota और reservation के,
सारी facilities मुहैय्या कराएगी..
और हिन्दुस्तान की परिभाषा,
अवश्य सार्थक हो जायेगी! "

...फिर नेता ने विभीषण का किरदार निभाया,
और बड़ी शान से रावण का पुतला जलाया.
इस वाकिये से तब मैं ऊब गया,
और गहरी सोच में डूब गया..

रावण के कई पुतलें
हम हर साल जलाते है,
मगर उन सामाजिक रावणों का क्या
जो mushroom की तरह उग आते है??

हम उस दौर में है जहां भगवान् का जन्मस्थान,
देश का कानून बताता है..
एक को तो श्री राम मार गए थे,
अब बाकियों का ख़याल सताता है... 

Monday, August 9, 2010

Riots- WHY??



This is the video we made for an assignment here at SIMC. It is also the first short-film/video made by the 2012 batch! Sameer Prabhu came up with the concept, I wrote the Nazm and recited. Swaraj, Prasad, Tushar, Swati, Rohit contributed too.

Here I am sharing the first few lines of my Nazm that are not included in the video:

जब भी दंगो के बारे में सोचता हूँ,
मैं सूखते ज़ख्मों को कुरेदता हूँ ...
ज़हन में आती है अखबारों में छपी तस्वीरें,
दिखाई देती है उधडी लाशें,
रोते तड़पते लोग..
रूह काप उठती है..

मैं न मंदिर न मस्जिद जाता हूँ,
बस चैन से जीना चाहता हूँ;
ये हक मुझे देता है भगवान्,
और इसे पुख्ता करता है संविधान...
मगर हम दोनों को मानते है,
दोनों की नहीं मानते;
यही बड़ी मुसीबत है,
सब जानते है...

The second part of this is covered in the video. I'll be waiting for your feedback!

Tuesday, July 27, 2010

अपना ख़याल रखिये...

(Photo courtesy: Bibartan Ghosh.)

याद कीजिये आखिरी बार आपने खुद से बात कब की थी. कब आपने खुद के साथ समय बिताया था? किस दिन आपने दूसरों को कोसने की बजाय अपने अन्दर झाँका था? सोचिये, कब आपने मुड़कर जिंदगी को देखा था. दरअसल हम सब दूसरों के साथ बाहर जाने, दोस्तों के साथ घूमने और रोज़मर्रा के कामों में इतने व्यस्त हो जाते है कि हमारे पास खुद के लिए समय नहीं बचता. ध्यान रहे, दोस्त आते-जाते रहेंगे मगर आप ज़िन्दगीभर खुद के साथ रहेंगे.

खुद के साथ समय बिताने का मतलब ये नहीं होता कि आप लोगों से दूर रहना पसंद करते है, बल्कि इसके मायने ये है कि आपको अपने खयालों में खोना अच्छा लगता है. इससे आप अपने आपको बेहतर तरीके से जान पायेंगे. हमें दोस्तों के साथ और अपने आप के साथ वक्त बिताने की  ज़रुरत होती है. दोनों के अपने फायदे है. दोस्तों के साथ रहने से आपको एहसास होता है कि आप किसी  बिरादरी का या कहिये एक समाज का हिस्सा है; जबकि खुद के साथ रहना आपको ये जानने में मदद करता है कि आप कौन है.

मान लीजिये ज़िन्दगी एक सफ़र है; हम सब अपनी-अपनी मंज़िल की तलाश में है. और हां हम अकेले नहीं है, एक हुजूम है जो हमारे साथ चलता है. आपको ये तय करना है कि आप इस भीड़ का हिस्सा बनना चाहते है या अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं. देखिये वक्त तेज़ी से चल रहा है, माफ़ कीजिये, दौड़ रहा है और जीने का करीना बदल रहा है. तो इस भाग-दौड़ भरी  ज़िन्दगी में बीच राह रूककर सफ़र का मुआयना करना बहुत ज़रूरी है. मुड़कर देखिये कितना रास्ता पार कर चुके है, और आगे के सफ़र की तैयारी कीजिये. 

खुद से प्यार कीजिये, क्योंकि मेरा मानना है कि लोग आपसे तब तक प्यार नहीं करेंगे जब तक आप खुद से प्यार करना नहीं सीखते. अकेले चाय- कॉफ़ी पीजिये, सुबह-सुबह सैर पर जाइए, बिना कारण मुस्कुराइए या फिर अपनों के साथ बिताए खूबसूरत पलों को याद कीजिये.  ये कुछ तरीके है जिससे आप अपने मन की battery charge कर सकते है. तन्हाई में आपके ख़याल खुली उड़ान भरते है. आप पर किसी प्रकार का pressure नहीं होता. ये वो समय है जब आपका असल व्यक्तित्व और सच्चे विचार बाहर आते हैं. इस एहसास का अपना मज़ा है. महसूस कीजिये, बयान करने को शब्द कम है.

चलते चलते...
दिल तो दिल है दिल की बातें समझ सको तो बेहतर है,
दुनिया की इस भीड़ में खुद को अलग रखो तो बेहतर है...
खामोशी भी एक सदा है अक्सर बाते करती है,
तुम भी इसको तन्हाई में कभी सुनो तो बेहतर है...

और हाँ, अपना ख़याल रखिये! :)